पवन कुमार सिंघ
सिक्किम के नाथुला दर्रे पर तैनात भारतीय सेना के
सिपाही हरभजन सिंह, जिन्हें “बाबा हरभजन सिंह” के नाम से जाना जाता है, की कहानी साहस, भक्ति और रहस्य का अनोखा संगम है। 23 पंजाब रेजिमेंट में सेवारत हरभजन सिंह का 1968 में नाथुला के पास एक नाले में डूबने से निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद, सैनिकों ने उनके सपनों में उनकी उपस्थिति महसूस की, जहाँ उन्होंने अपनी मृत्यु का स्थान बताया। उनके सहयोगी प्रीतम सिंह के सपने में दिए स्थान पर उनका शव मिला, जिसके बाद उनकी इच्छानुसार छोक्या छो में समाधि बनाई गई।
बाबा हरभजन सिंह को माना जाता है कि वह आज भी सिक्किम-चीन सीमा पर भारतीय सैनिकों की रक्षा करते हैं। सैनिकों का विश्वास है कि बाबा सपनों के जरिए चीनी सेना की गतिविधियों की अग्रिम चेतावनी देते हैं, जो हमेशा सटीक साबित होती हैं। उनकी समाधि, बाबा हरभजन सिंह मंदिर, 13,123 फीट की ऊँचाई पर नाथुला और जेलेपला दर्रे के बीच स्थित है, जहाँ उनकी वर्दी, जूते और बिस्तर रोज़ तैयार किए जाते हैं। आश्चर्यजनक रूप से, सुबह बिस्तर पर सिलवटें और जूतों पर कीचड़ मिलता है, मानो बाबा रात में गश्त करते हों।
यहां तक कि चीनी सैनिक भी उनकी आत्मा का सम्मान करते हैं और फ्लैग मीटिंग्स में उनके लिए कुर्सी खाली रखते हैं। बाबा को मानद कप्तान की उपाधि दी गई, और पहले उनकी तनख्वाह और छुट्टियों का प्रबंध भी किया जाता था। यह कहानी हमें सिखाती है कि देशभक्ति और कर्तव्य की भावना मृत्यु के बाद भी जीवित रह सकती है। आइए, बाबा हरभजन सिंह के इस अमर शौर्य को नमन करें और उनकी कहानी को साझा कर औरों को प्रेरित करें!




