शैलपुत्री की कथा के अनुसार, सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव के अपमान को सहन न कर पाते हुए योगाग्नि में स्वयं को भस्म कर लिया. अगले जन्म में उन्होंने पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया और देवी पार्वती या शैलपुत्री कहलाईं. इस प्रकार वह नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं.
सती के रूप में:
- राजा दक्ष ने एक महान यज्ञ का आयोजन किया, लेकिन उन्होंने अपनी पुत्री सती और दामाद शिव को निमंत्रण नहीं भेजा.
- सती यज्ञ में गईं, लेकिन वहाँ उन्हें और शिव को अपमानित किया गया.
- इस अपमान को सह न पाने के कारण सती ने यज्ञ कुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए.
- अपने इस बलिदान से उन्हें अत्यंत दुख और क्रोध आया, जिसके बाद भगवान शिव ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर दिया.
शैलपुत्री के रूप में:
- इस दुखद घटना के बाद देवी सती ने पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया.
- पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण उन्हें शैलपुत्री कहा गया.
- शैलपुत्री ही देवी पार्वती के रूप में जानी जाती हैं और उन्होंने घोर तपस्या के बाद पुनः भगवान शिव को अपने पति रूप में प्राप्त किया.
- नवरात्रि के पहले दिन शैलपुत्री की पूजा की जाती है.
महत्व:
- मां शैलपुत्री की पूजा से भक्तों को जीवन में स्थिरता, शांति और सफलता प्राप्त होती है.
- उनकी आराधना से मन को ‘मूलाधार’ चक्र में स्थित करने में मदद मिलती है, जो योग साधना का प्रारंभिक चरण है.





