प्रदेश एक पर्वतीय राज्य है, जो आदिकाल से पौराणिक परंपराओं, देवी-देवताओं में आस्था और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए है। यहां शैव, शाक्त, वैष्णव, बौद्ध और जैन मतों की संस्कृतियां विकसित होती रही हैं। प्रदेश की अधिकांश आबादी ग्रामीण क्षेत्र से जुड़ी हुई है, जहां लोग सरल, भोले-भाले और सत्यनिष्ठ हैं। प्रदेश के नागरिकों को अपने भूमि व घरेलू कार्यों के लिए न्यायालयों, तहसीलों, एसडीएम और डीसी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। इन कार्यों के लिए इच्छापत्र, पावर ऑफ अटॉर्नी, हलफनामे और अन्य दस्तावेज तैयार करवाने होते हैं, जो अधिकतर अंग्रेजी भाषा में बनाए जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकतर लोग अंग्रेजी भाषा से अनभिज्ञ होने के कारण इन दस्तावेजों की विषयवस्तु को समझ नहीं पाते, जिससे उन्हें कोर्ट-कचहरियों में अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इस संबंध में पूर्व सचिव हिमाचल संस्कृत अकादमी डॉ. मस्तराम शर्मा ने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू तथा राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी से आग्रह किया है कि जनहित को ध्यान में रखते हुए हलफनामों को अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी भाषा में भी तैयार करने की अनुमति दी जाए, ताकि आम किसान और ग्रामीण नागरिक यह समझ सकें कि दस्तावेजों में क्या लिखा गया है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान में इन कागजातों को टाइप करवाने और हस्ताक्षरित करवाने के नाम पर लोगों से मनमाना और अत्यधिक पैसा वसूला जाता है, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। डॉ. शर्मा ने मांग की कि विभिन्न दस्तावेजों के लिए निश्चित शुल्क तय करने के स्पष्ट नियम बनाए जाएं, ताकि आम जनता का शोषण रोका जा सके। डॉ. मस्तराम शर्मा ने कहा कि हिंदी हमारी राष्ट्रीय भाषा है और प्रदेश की आम जनता की भाषा भी है। यदि हलफनामे हिंदी में तैयार करने की व्यवस्था की जाती है, तो इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और गरीब व ग्रामीण जनता को आर्थिक राहत मिलेगी। उन्होंने मुख्यमंत्री से इस विषय पर शीघ्र संज्ञान लेकर आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की है।





