February 5, 2026 2:53 pm

गुरु बृहस्पतिजी और देवराज इंद्र संवाद

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संक्षिप्त रामायण(भार्गव)

गुरु बृहस्पतिजी और देवराज इंद्र संवाद(अध्याय66)

भरतजी की यह दशा देखकर देवता फूल बरसाने लगे। पृथ्वी कोमल हो गई और मार्ग मंगल का मूल बन गया। रस्ते में वे लोग हैं जिन्होंने राम का दर्शन किया था, अब भरतजी के दर्शन ने तो उनका भव जन्म-मरण रूपी रोग मिटा ही दिया।

भरतजी के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है, जिन्हें श्री रामजी स्वयं अपने मन में स्मरण करते रहते हैं। जगत्‌ में जो भी मनुष्य एक बार राम कह लेते हैं, वे भी तरने-तारने वाले हो जाते हैं।

भरतजी के इस प्रेम के प्रभाव को देखकर देवराज इन्द्र को सोच हो गया कि कहीं इनके प्रेमवश श्री रामजी लौट न जाएँ और हमारा बना-बनाया काम बिगड़ जाए। उसने गुरु बृहस्पतिजी से कहा- हे प्रभो! वही उपाय कीजिए जिससे श्री रामचंद्रजी और भरतजी की भेंट ही न हो।

श्री रामचंद्रजी तो प्रेम के वश हैं और भरतजी प्रेम के समुद्र हैं। बनी-बनाई बात बिगड़ना चाहती है, इसलिए कुछ छल ढूँढकर इसका उपाय कीजिए।

इंद्र के वचन सुनते ही देवगुरु बृहस्पतिजी मुस्कुराए। उन्होंने हजार नेत्रों वाले इंद्र को मूर्ख समझा और कहा- हे देवराज! माया के स्वामी श्री रामचंद्रजी के सेवक के साथ कोई माया करता है तो वह उलटकर अपने ही ऊपर आ पड़ती है॥ पिछली बार तो श्री रामचंद्रजी का रुख जानकर ही कुछ किया था, परन्तु इस समय कुचाल करने से हानि ही होगी।

जो अपराधु भगत कर करई। राम रोष पावक सो जरई॥ लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा। यह महिमा जानहिं दुरबासा॥

हे देवराज! श्री रघुनाथजी का स्वभाव सुनो, वे अपने प्रति किए हुए अपराध से कभी रुष्ट नहीं होते॥ पर जो कोई उनके भक्त का अपराध करता है, वह श्री राम की क्रोधाग्नि में जल जाता है। लोक और वेद दोनों में इतिहास प्रसिद्ध है। इस महिमा को दुर्वासाजी जानते हैं॥

भरत सरिस को राम सनेही। जगु जप राम रामु जप जेही॥

सारा जगत्‌ श्री राम को जपता है, वे श्री रामजी जिनको जपते हैं, उन भरतजी के समान श्री रामचंद्रजी का प्रेमी कौन होगा?

हे देवराज! रघुकुलश्रेष्ठ श्री रामचंद्रजी के भक्त का काम बिगाड़ने की बात मन में भी न लाइए। ऐसा करने से लोक में अपयश और परलोक में दुःख होगा और शोक का सामान दिनोंदिन बढ़ता ही चला जाएगा॥ भगवान सम हैं। उनमें न राग है, न रोष है और न वे किसी का पाप-पुण्य और गुण-दोष ही ग्रहण करते हैं।

करम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥ उन्होंने विश्व में कर्म को ही प्रधान कर रखा है। जो जैसा करता है, वह वैसा ही फल भोगता है॥

भक्त को प्रेम से गले लगा लेते हैं और अभक्त को मारकर तार देते हैं। गुणरहित, निर्लेप, मानरहित और सदा एकरस भगवान्‌ श्री राम भक्त के प्रेमवश ही सगुण हुए हैं॥ भरतजी तो भक्तों के शिरोमणि हैं, उनसे बिलकुल न डरो। तुम व्यर्थ ही स्वार्थ के विशेष वश होकर व्याकुल हो रहे हो। इसमें भरतजी का कोई दोष नहीं, तुम्हारा ही मोह है॥

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